Birth Ledger
جنم پتری
जन्म पत्री
Riaz Akber
31 Dec 2025
" اب تو نے بلایا ہے تو آتی ہوں میں۔ کیا فرق پڑتا ہے بھگوان، کئی آتے جاتے ہیں یہاں۔ بس آس پڑوس کے دو چار لوگ ایک دوسرے سے یہی کہیں گے نا کہ رات کے کسی سمے وہ نکڑ کے جھونپڑے والی بڑھیا گزر گئی، اور پھر سب اپنے اپنے دھندوں پر لگ جائیں گے۔ کوئ ہفتے بھر یہ جھونپڑی خالی رہے گی، پھر کوئی اور آن بسے گا۔ اب تجھے کیا بتائوں رے۔ تُو تو شروع سے ہی دیکھ رہا ہے۔ کوئی نیا سورج تھوڑی چڑھتا ہے یہاں پر؟ بس ہر روز وہی کل کا پرانا سانجھ سویرا لوٹ کر آ جاتا ہے۔ ہم جھونپڑے والے لوگ ہیں، بھگوان۔ ہم وقت کا اندازہ سر کے بال سفید ہونے سے لگاتے ہیں۔
اب آتی کل کے روز بھی، ہمیشہ کی طرح، صبح سویرے کوڑے کے ٹرک مال کی ڈھیری لگانے آئیں گے۔ شہر کی چھوڑی ہوئی گندگی کا یہ پہاڑ ذرا اور پھیل جائے گا۔ پھر برابر کے جھونپڑے والا رامو نکل کر اس نئے دفینے سے ربڑ کے پرانے جوتے، اور سائیکل کے ٹیوب ٹائر کھوجے گا۔ اگلی گلی کی آشا پلاسٹک کے تھیلوں کی آس لگائے گی- اور وہ رشید، میرے جیسے دھندے والا، گتے کے ڈبے اٹھائے گا۔ تُو دور سے دیکھتا ہے نا۔ وہاں سے تو تجھے ہم سب لوگ کسی گندگی کے ڈھیر پر رینگتے ہوئے کیڑوں جیسے لگتے ہوں گے۔ جب ہوائی اڈے کا جہاز اوپر سے گزرتا ہے، تب بھی میں یہی سوچتی ہوں۔
اب تُو اس بڑھیا کا کرے گا کیا، یہ مجھے کیا معلوم؟ مجھے تو یہ بھی معلوم نہیں کہ جس ماں نے مجھے جنما وہ ہندو تھی یا مسلمان، یا شاید سکھ۔ جن کے گھر میں ذرا بڑی ہوئی انہوں نے بس اتنا بتایا کہ بٹوارے کے دنوں میں لاشوں کے ایک ڈھیر کے بیچ سے اٹھایا تھا مجھے۔ پورے بارہ سال تک ان کے ہاں رہی مَیں۔ اب تُو تو جانتا ہے نا کہ کتنے برے لوگ تھے وہ۔ اپنے بچوں کو اسکول بھیجتے اور مجھ سے گھر کے کام کرواتے۔ اس کا لڑکا، وہ حرامی مجھے ننگا کر کے کھیلنے لگ پڑا تھا۔ اور اس کے بدلے مجھ درد کی ماری روتی کو دیتا کیا تھا وہ؟ میری من بھاتی گڑ چاول کی گجک کا ٹکڑا۔ تبھی تو بھاگی تھی مَیں اس گھر سے۔ تین دن تین رات اسی شہر میں ننگے پائوں، سرکاری نلوں کا پانی پی کر، ادھر سے ادھر چلتی رہی، تب یہ جگہ ملی۔
تجھے تو یاد ہے نا بھگوان کہ ان دنوں یہاں دھوبی گھاٹ تھا۔ تو بس میں اسی دھندے میں لگ گئی۔ کپڑے اٹھا کر الگنیوں کی رسیوں پر ڈالتے، گدھوں کے آگے چارا رکھتے، روٹی پانی کرتے، مانگے تانگے کا سگرٹ پیتے، پھر رات جھونپڑے میں اکیلی ہنستے روتے، یوں مَیں نے اپنی جوانی بتائی۔ کھانا پینا تو چلتا تھا بھگوان، پر ساری جوانی میں نے چاول گڑ کی گچک کو پھر سے ہاتھ تک نہیں لگایا۔ بس نفرت ہو گئی تھی مجھے اس کھاجے سے۔ اور پھر یوں ہوا کہ دھیرے دھیرے دھوبی آنے کم ہوگئے۔ گھاٹ کا پانی خشک پڑنے لگا، اور شہر کے کوڑا کرکٹ سے لدے گڈے اور ٹرک یہاں پہنچنے لگے۔ کوڑے کا یہ پہاڑ بن گیا پر میں یہی رہی۔ بس اپنا دھندا بدل لیا۔ گتے کے خالی ڈبے اور پھٹے ہوئے کاغذ جمع کرنے لگی۔ پر تجھے کیا بتانا، تجھے تو سبھی کچھ معلوم ہے۔
اب تو سورگ دے یا نرگ وہ بھی تیری مرضی ہے۔ جنم بھی کون سا اپنی مرضی سے جیا۔ ردی کاغذ کا ایک ٹکڑا تھی مَیں، جو گلی کے بیچ ہوا سے اڑ کر کبھی کسی دیوار سے ٹکرایا، تو کبھی کسی نالی میں جا گرا۔ یہ گلی میری تھی، نہ ہوا، نہ دیوار، نہ نالی۔ سو اب آتی بار بھگوان مجھ پر بس اتنی سی كرپا کرنا کہ میری جنم پتری کا ورقہ کورا ہی رہنے دینا۔ اب آتی بار خود لکھوں گی مَیں۔"
اب آتی کل کے روز بھی، ہمیشہ کی طرح، صبح سویرے کوڑے کے ٹرک مال کی ڈھیری لگانے آئیں گے۔ شہر کی چھوڑی ہوئی گندگی کا یہ پہاڑ ذرا اور پھیل جائے گا۔ پھر برابر کے جھونپڑے والا رامو نکل کر اس نئے دفینے سے ربڑ کے پرانے جوتے، اور سائیکل کے ٹیوب ٹائر کھوجے گا۔ اگلی گلی کی آشا پلاسٹک کے تھیلوں کی آس لگائے گی- اور وہ رشید، میرے جیسے دھندے والا، گتے کے ڈبے اٹھائے گا۔ تُو دور سے دیکھتا ہے نا۔ وہاں سے تو تجھے ہم سب لوگ کسی گندگی کے ڈھیر پر رینگتے ہوئے کیڑوں جیسے لگتے ہوں گے۔ جب ہوائی اڈے کا جہاز اوپر سے گزرتا ہے، تب بھی میں یہی سوچتی ہوں۔
اب تُو اس بڑھیا کا کرے گا کیا، یہ مجھے کیا معلوم؟ مجھے تو یہ بھی معلوم نہیں کہ جس ماں نے مجھے جنما وہ ہندو تھی یا مسلمان، یا شاید سکھ۔ جن کے گھر میں ذرا بڑی ہوئی انہوں نے بس اتنا بتایا کہ بٹوارے کے دنوں میں لاشوں کے ایک ڈھیر کے بیچ سے اٹھایا تھا مجھے۔ پورے بارہ سال تک ان کے ہاں رہی مَیں۔ اب تُو تو جانتا ہے نا کہ کتنے برے لوگ تھے وہ۔ اپنے بچوں کو اسکول بھیجتے اور مجھ سے گھر کے کام کرواتے۔ اس کا لڑکا، وہ حرامی مجھے ننگا کر کے کھیلنے لگ پڑا تھا۔ اور اس کے بدلے مجھ درد کی ماری روتی کو دیتا کیا تھا وہ؟ میری من بھاتی گڑ چاول کی گجک کا ٹکڑا۔ تبھی تو بھاگی تھی مَیں اس گھر سے۔ تین دن تین رات اسی شہر میں ننگے پائوں، سرکاری نلوں کا پانی پی کر، ادھر سے ادھر چلتی رہی، تب یہ جگہ ملی۔
تجھے تو یاد ہے نا بھگوان کہ ان دنوں یہاں دھوبی گھاٹ تھا۔ تو بس میں اسی دھندے میں لگ گئی۔ کپڑے اٹھا کر الگنیوں کی رسیوں پر ڈالتے، گدھوں کے آگے چارا رکھتے، روٹی پانی کرتے، مانگے تانگے کا سگرٹ پیتے، پھر رات جھونپڑے میں اکیلی ہنستے روتے، یوں مَیں نے اپنی جوانی بتائی۔ کھانا پینا تو چلتا تھا بھگوان، پر ساری جوانی میں نے چاول گڑ کی گچک کو پھر سے ہاتھ تک نہیں لگایا۔ بس نفرت ہو گئی تھی مجھے اس کھاجے سے۔ اور پھر یوں ہوا کہ دھیرے دھیرے دھوبی آنے کم ہوگئے۔ گھاٹ کا پانی خشک پڑنے لگا، اور شہر کے کوڑا کرکٹ سے لدے گڈے اور ٹرک یہاں پہنچنے لگے۔ کوڑے کا یہ پہاڑ بن گیا پر میں یہی رہی۔ بس اپنا دھندا بدل لیا۔ گتے کے خالی ڈبے اور پھٹے ہوئے کاغذ جمع کرنے لگی۔ پر تجھے کیا بتانا، تجھے تو سبھی کچھ معلوم ہے۔
اب تو سورگ دے یا نرگ وہ بھی تیری مرضی ہے۔ جنم بھی کون سا اپنی مرضی سے جیا۔ ردی کاغذ کا ایک ٹکڑا تھی مَیں، جو گلی کے بیچ ہوا سے اڑ کر کبھی کسی دیوار سے ٹکرایا، تو کبھی کسی نالی میں جا گرا۔ یہ گلی میری تھی، نہ ہوا، نہ دیوار، نہ نالی۔ سو اب آتی بار بھگوان مجھ پر بس اتنی سی كرپا کرنا کہ میری جنم پتری کا ورقہ کورا ہی رہنے دینا۔ اب آتی بار خود لکھوں گی مَیں۔"
“अब तूने बुलाया है तो आती हूँ मैं। क्या फर्क पड़ता है, भगवान—कई आते-जाते हैं यहाँ। बस आस-पड़ोस के दो-चार लोग एक-दूसरे से यही कहेंगे न कि रात के किसी समय नुक्कड़ की झोंपड़ी वाली बुढ़िया गुजर गई। और फिर सब अपने-अपने धंधों में लग जाएँगे। कोई हफ्ते-भर यह झोंपड़ी खाली रहेगी, फिर कोई और आ बसेगा। अब तुझे क्या बताऊँ रे—तू तो शुरू से ही देख रहा है। कोई नया सूरज थोड़े ही उगता है यहाँ? हर रोज़ वही कल का पुराना साँझ-सवेरा लौट आता है। हम झोंपड़ी वाले लोग हैं, भगवान। हम वक्त का अंदाज़ा सिर के बालों के सफ़ेद होने से लगाते हैं।
अब आती कल के रोज़ भी, हमेशा की तरह, सुबह-सवेरे कूड़े के ट्रक यहाँ माल की ढेरी लगाने आएँगे।
शहर की छोड़ी हुई गंदगी का यह पहाड़ थोड़ा और फैल जाएगा। फिर बराबर की झोंपड़ी वाला रामू निकलेगा और इस नए दफ़ीने से रबर के पुराने जूते और साइकिल की ट्यूबें खोजेगा। अगली गली की आशा प्लास्टिक की थैलियों की आस लगाएगी— और वह राशिद, मेरे जैसे ही धंधे वाला, गत्ते के डिब्बे उठाएगा। तू दूर से देखता है न, भगवान - वहाँ से तो हम सब लोग किसी गंदगी के ढेर पर रेंगते हुए कीड़ों जैसे लगते । जब हवाई अड्डे का जहाज ऊपर से गुजरता है, तब भी मैं यही सोचती हूँ।
अब तू इस बुढ़िया का करेगा क्या—यह मुझे क्या मालूम? मुझे तो यह भी नहीं पता कि जिस माँ ने मुझे जना, वह हिंदू थी या मुसलमान—या शायद सिख। जिनके घर में मैं ज़रा बड़ी हुई, उन्होंने बस इतना बताया कि बँटवारे के दिनों में लाशों के एक ढेर के बीच से उठाई गई थी मैं। पूरे बारह साल तक उनके यहाँ रही मैं। तू तो जानता है, भगवान, कितने बुरे लोग थे वे। अपने बच्चों को स्कूल भेजते थे, और मुझसे घर के काम करवाते थे। उसका लड़का—वह हरामी—मुझे नंगा कर के खेलने लगा था। और बदले में मेरी दर्द से रोती देह को देता क्या था? मेरी मन-भाती गुड़-चावल की गजक का एक टुकड़ा। तभी तो भागी थी मैं उस घर से। तीन दिन-तीन रात इसी शहर में नंगे पाँव, सरकारी नलों का पानी पीकर, इधर-उधर भटकती रही—तब यह जगह मिली।
तुझे याद है न, भगवान—उन दिनों यहाँ धोबी घाट था। तो बस मैं उसी धंधे में लग गई। कपड़े उठाकर अलगनियों की रस्सियों पर डालना, गधों के आगे चारा रखना, रोटी-पानी करना, माँगे-ताँगे का सिगरेट पीना, और फिर रात को झोंपड़ी में अकेली हँसते-रोते— यूँ मैंने अपनी जवानी बिताई। खाना-पीना तो चलता रहा, भगवान, पर सारी जवानी मैंने चावल-गुड़ की उस गजक को फिर हाथ तक नहीं लगाया।
उस मिठाई से मुझे नफ़रत हो गई थी।
धीरे-धीरे धोबी आने बंद हो गए। और घाट सूख गया। और शहर का कूड़ा-करकट ढोने वाले गधे और ट्रक यहाँ आने लगे। कूड़े का यह ढेर पहाड़ बन गया—पर मैं यहीं रही। बस अपना धंधा बदल लिया। गत्ते के खाली डिब्बे और फटे काग़ज़ बटोरने लगी। पर तुझे क्या बताना, भगवान—तुझे तो सब कुछ पता है। अब तू स्वर्ग दे या नरक—वह भी तेरी मर्ज़ी है। जनम भी कौन-सा अपनी मर्ज़ी से जिया। रद्दी काग़ज़ का एक टुकड़ा थी मैं—जो गली के बीच हवा में उड़कर कभी किसी दीवार से टकराया,
तो कभी किसी नाली में जा गिरा। यह गली मेरी थी, न हवा, न दीवार, न नाली।
तो अब आती बार, भगवान, मुझ पर बस इतनी-सी कृपा करना— कि मेरी जन्म-पत्री का पन्ना कोरा ही रहने देना। अब आती बार ख़ुद लिखूँगी मैं।”
अब आती कल के रोज़ भी, हमेशा की तरह, सुबह-सवेरे कूड़े के ट्रक यहाँ माल की ढेरी लगाने आएँगे।
शहर की छोड़ी हुई गंदगी का यह पहाड़ थोड़ा और फैल जाएगा। फिर बराबर की झोंपड़ी वाला रामू निकलेगा और इस नए दफ़ीने से रबर के पुराने जूते और साइकिल की ट्यूबें खोजेगा। अगली गली की आशा प्लास्टिक की थैलियों की आस लगाएगी— और वह राशिद, मेरे जैसे ही धंधे वाला, गत्ते के डिब्बे उठाएगा। तू दूर से देखता है न, भगवान - वहाँ से तो हम सब लोग किसी गंदगी के ढेर पर रेंगते हुए कीड़ों जैसे लगते । जब हवाई अड्डे का जहाज ऊपर से गुजरता है, तब भी मैं यही सोचती हूँ।
अब तू इस बुढ़िया का करेगा क्या—यह मुझे क्या मालूम? मुझे तो यह भी नहीं पता कि जिस माँ ने मुझे जना, वह हिंदू थी या मुसलमान—या शायद सिख। जिनके घर में मैं ज़रा बड़ी हुई, उन्होंने बस इतना बताया कि बँटवारे के दिनों में लाशों के एक ढेर के बीच से उठाई गई थी मैं। पूरे बारह साल तक उनके यहाँ रही मैं। तू तो जानता है, भगवान, कितने बुरे लोग थे वे। अपने बच्चों को स्कूल भेजते थे, और मुझसे घर के काम करवाते थे। उसका लड़का—वह हरामी—मुझे नंगा कर के खेलने लगा था। और बदले में मेरी दर्द से रोती देह को देता क्या था? मेरी मन-भाती गुड़-चावल की गजक का एक टुकड़ा। तभी तो भागी थी मैं उस घर से। तीन दिन-तीन रात इसी शहर में नंगे पाँव, सरकारी नलों का पानी पीकर, इधर-उधर भटकती रही—तब यह जगह मिली।
तुझे याद है न, भगवान—उन दिनों यहाँ धोबी घाट था। तो बस मैं उसी धंधे में लग गई। कपड़े उठाकर अलगनियों की रस्सियों पर डालना, गधों के आगे चारा रखना, रोटी-पानी करना, माँगे-ताँगे का सिगरेट पीना, और फिर रात को झोंपड़ी में अकेली हँसते-रोते— यूँ मैंने अपनी जवानी बिताई। खाना-पीना तो चलता रहा, भगवान, पर सारी जवानी मैंने चावल-गुड़ की उस गजक को फिर हाथ तक नहीं लगाया।
उस मिठाई से मुझे नफ़रत हो गई थी।
धीरे-धीरे धोबी आने बंद हो गए। और घाट सूख गया। और शहर का कूड़ा-करकट ढोने वाले गधे और ट्रक यहाँ आने लगे। कूड़े का यह ढेर पहाड़ बन गया—पर मैं यहीं रही। बस अपना धंधा बदल लिया। गत्ते के खाली डिब्बे और फटे काग़ज़ बटोरने लगी। पर तुझे क्या बताना, भगवान—तुझे तो सब कुछ पता है। अब तू स्वर्ग दे या नरक—वह भी तेरी मर्ज़ी है। जनम भी कौन-सा अपनी मर्ज़ी से जिया। रद्दी काग़ज़ का एक टुकड़ा थी मैं—जो गली के बीच हवा में उड़कर कभी किसी दीवार से टकराया,
तो कभी किसी नाली में जा गिरा। यह गली मेरी थी, न हवा, न दीवार, न नाली।
तो अब आती बार, भगवान, मुझ पर बस इतनी-सी कृपा करना— कि मेरी जन्म-पत्री का पन्ना कोरा ही रहने देना। अब आती बार ख़ुद लिखूँगी मैं।”
“Now that You have called, I come. What difference does it make, God—
many come and go here. A few neighbours will say to each other, won’t they, that sometime in the night the old woman from the corner shack passed away. Then everyone will return to their own routines. For a week or so this hut will remain empty. Then someone else will move in.
What more should I tell You? You have been watching from the beginning. No new sun rises here. Every day the same worn-out dusk and dawn return. We are shack-dwellers, God. We measure time by the whitening of hair. Tomorrow too, as always, at first light, garbage trucks will arrive to unload their heaps. The mountain of the city’s discarded filth will spread a little more. The man in the next hut—Ramu—will search this fresh deposit for worn-out rubber shoes and discarded bicycle tubes. Asha from the next lane will hope for plastic bags. And Rashid—in the same trade as me— will lift cardboard boxes. You watch from afar, don’t You? From there, we must look like insects crawling over a mound of waste. Even when an aeroplane passes overhead, that is what I think.
What You will do with this old woman—I do not know. I do not even know whether the mother who gave birth to me was Hindu, Muslim, or perhaps Sikh. The family where I grew a little older only told me this: during the days of Partition I was picked up from among a heap of corpses. I lived with them for twelve years. You know, God, how cruel they were. They sent their own children to school and made me do the housework. Their son—that bastard—used to strip me naked and play with me. And what did he give me in return for my crying, aching body? A piece of jaggery-and-rice brittle—the sweet I loved most. That is why I ran away from that house.
For three days and three nights I wandered barefoot through this city, drinking water from public taps, until I found this place. You remember, God— there used to be a washermen’s ghat here. So I joined that work. Carrying clothes, hanging them on ropes, feeding the donkeys, earning bread and water, smoking borrowed cigarettes, and at night—alone in the hut— laughing and crying by turns. That is how I spent my youth. I managed food and drink, God, but through all those years
I never touched jaggery-and-rice brittle again. I had grown to hate that sweet.
Slowly the washermen stopped coming. The ghat dried up. Carts and trucks laden with the city’s garbage arrived instead. The pile grew into a mountain—but I stayed. I only changed my trade. I began collecting empty cardboard boxes and torn paper. But what is there to tell You? You already know everything.
Whether You give me heaven or hell— that too is Your choice. Life was never lived by my choosing anyway. I was a scrap of waste paper, blown by the wind down the lane, sometimes striking a wall, sometimes falling into a drain. The lane was not mine, nor the wind, nor the wall, nor the drain.
So next time, God, grant me only this small mercy: leave the page of my birth-ledger blank. Next time, I will write it myself.”
many come and go here. A few neighbours will say to each other, won’t they, that sometime in the night the old woman from the corner shack passed away. Then everyone will return to their own routines. For a week or so this hut will remain empty. Then someone else will move in.
What more should I tell You? You have been watching from the beginning. No new sun rises here. Every day the same worn-out dusk and dawn return. We are shack-dwellers, God. We measure time by the whitening of hair. Tomorrow too, as always, at first light, garbage trucks will arrive to unload their heaps. The mountain of the city’s discarded filth will spread a little more. The man in the next hut—Ramu—will search this fresh deposit for worn-out rubber shoes and discarded bicycle tubes. Asha from the next lane will hope for plastic bags. And Rashid—in the same trade as me— will lift cardboard boxes. You watch from afar, don’t You? From there, we must look like insects crawling over a mound of waste. Even when an aeroplane passes overhead, that is what I think.
What You will do with this old woman—I do not know. I do not even know whether the mother who gave birth to me was Hindu, Muslim, or perhaps Sikh. The family where I grew a little older only told me this: during the days of Partition I was picked up from among a heap of corpses. I lived with them for twelve years. You know, God, how cruel they were. They sent their own children to school and made me do the housework. Their son—that bastard—used to strip me naked and play with me. And what did he give me in return for my crying, aching body? A piece of jaggery-and-rice brittle—the sweet I loved most. That is why I ran away from that house.
For three days and three nights I wandered barefoot through this city, drinking water from public taps, until I found this place. You remember, God— there used to be a washermen’s ghat here. So I joined that work. Carrying clothes, hanging them on ropes, feeding the donkeys, earning bread and water, smoking borrowed cigarettes, and at night—alone in the hut— laughing and crying by turns. That is how I spent my youth. I managed food and drink, God, but through all those years
I never touched jaggery-and-rice brittle again. I had grown to hate that sweet.
Slowly the washermen stopped coming. The ghat dried up. Carts and trucks laden with the city’s garbage arrived instead. The pile grew into a mountain—but I stayed. I only changed my trade. I began collecting empty cardboard boxes and torn paper. But what is there to tell You? You already know everything.
Whether You give me heaven or hell— that too is Your choice. Life was never lived by my choosing anyway. I was a scrap of waste paper, blown by the wind down the lane, sometimes striking a wall, sometimes falling into a drain. The lane was not mine, nor the wind, nor the wall, nor the drain.
So next time, God, grant me only this small mercy: leave the page of my birth-ledger blank. Next time, I will write it myself.”